शनिवार, 9 मार्च 2013



लेखक-बजरंग यादव
बेलादुला खर्राघाट रायगढ़
उत्तर दिशा की हवाएं (छोटी सी यात्रा)
हरे भरे वनों के बीच में एक छोटा सा पाहाड़ी कोरवाओं का समुदाय पिछली कई पीढिय़ों से आखेट और कृषि करके अपना जीवन व्यतित करते आ रहे हैं शिक्षा और बाहर की संस्कृति से बहुत दूर इनका अपना जीवन जीने का कुछ अलग ही अंदाज है। जड़ी बूटियों और जंगल के कंद मूलों से ही से अपना गुजारा करने वाले और कम वस्त्रों में रहने वाले लोगों के बीच में पहुंचने के बाद उनके बारे में जानने की जिज्ञासा और भी बढ़ जाती है घर में न तो ठीक से दवारजे हैं और न ही बड़े बड़े कमरे। दिनभर खेती किसानी और आखेट करने के बाद जब शाम को सब अपने अपने घर आते हैं सभी एक दूसरे को उनके पसंदीदा स्थान जिसका मैं नाम भी नहीं जानता उपस्थित होकर नाचते गाते हैं और शराब की लहरों में बहकर अपना मनोरंजन करते हैं ग्रामीण महिलायें पुरूषों की सेवा करती हैं जैसे उन्हें शराब की पूर्ति कराना, किसी अतिथि की देखभाल करना और मेहमान नवाजी में कोई कमी नहीं होने देना। इनके बीच में जाकर मुझे ऐसा लगा मानो धरती में अगर इंसान को कहीं सकून मिल सकता है तो वो यहीं है। मांदर की थाप और महुआ के फूलों का वो मादक गंध मन को भाव विभोर कर रहा था युवक युवतियों द्वारा सामूहिक नृत्य किया जा रहा था और मैं उन लोगों के बीच में स्वयं को उन्हीं के समान समझ रहा था कई बार मुझे भी ग्रामीणों द्वारा नृत्य के लिए उकसाना और खिंचते हुए ले जाना बहुत ही अच्छा अनुभव था मेरे लिए ।
दरअसल मैं बात कर रहा हूं सरगुजा जिले के पर्वतीय क्षेत्रों में निवास करने वाले पहाड़ी कोरवाओं के समुदाय के बारे में जब मैं उन लोगों के संपर्क में आया था तो मुझे इनसे डर लगता था बचपन से सुना था मैंने की ये अपने खेतों में फसल लगाने के पहले देवी देवताओं की पूजा करते हैं और भेंट स्वरूप अपने देवताओं को नर बलि देते हैं। पर इनके साथ वक्त बिताने के बाद मेरे सारे भ्रम दूर हो गये। सरगुजा और जशपुर की सीमा से लगा हुआ है बोदा ग्राम जहां मैं सात दिन रहा और मेरे एक मित्र हैं टिरंग ग्राम में जो बोदा से महज 8 किलोमीटर की दूरी पर है उत्तर दिशा होने के कारण यहां हर सवाल का जवाब मिल ही जाता है नदी, झरनों का प्राकृतिक सौंदर्य, ग्रामीणों का शहरी वेशभूषा से दूर और हमारी संस्कृति से परे रहने वाले भोले-भाले ग्रामीणों के बीच जब कोई पढ़ा लिखा इंसान पहुंच जाए तो सबकी नजरें उस पर टिक जाती हैं कई लोंगों की आंखों में एक चमक सी आ जाती है और वे कुछ उम्मीद भी जगा लेते हैं अपने मन में। 
एक शाम मैं गांव के तालाब के किनारे शीशे के समान स्वच्छ जल में मछलियों को देख कर कल्पना कर रहा था और अपने ही धून में खोया हुआ कुछ सोंच रहा था तभी उस शांत वातावरण में एक पूरानी साईकिल जिसे देख कर ही लग रहा था मानों मनु के युग का हो, जोर शोर की आवाज करते मेरी ओर ही चली आ रही थी और देखते ही देखते मेरे करीब आ गई। उसमें से एक ही व्यक्ति सवार था और वह हाथ में एक कागज की पर्ची पकड़े हुए झिझक भरे स्वर में मुझसे कुछ पूछना चाहता था मैंने उसकी और देखा और देखते ही उसकी स्थिति भांप गया। नंगे पैर और लूंगी पहने एक अशिक्षा का शिकार व्यक्ति हाथ में जब पाती लिये आपके पास आये तो समझ ही सकते हैं कि उसे कुछ पूछना है। उसके कुछ कहने से पहले ही मैंने उससे कह दिया कि बताईये मैं आपकी क्या मदद कर सकता हुं उसने मेरे हाथ में वो कागज का टूकड़ा थमा दिया और कहां जाना पड़ेगा मुझसे कहने लगा हिंदी भी उसकी ठीक नहीं होने के कारण टूटी-फूटी हिंदी ही बोलते हुए कहने लगा तो मैंने ही अपनी बोली बदल ली मैं ने उससे कहा सिधा जाबे आखन एगोट सेठ कर दुकान आहे फिर ओ बट ले सीधा जाबे फिर ओ जग ले सरपंच कर घर हे (ये मैंने सरगुजिया ठेठ बोली में उससे कहा) उसने मेरी ओर एकटक होकर देखा उसे ऐसा लगा मानो ये हमारे ही बीच का इंसान है बस पहनावे से शहरी लगता है और मुस्कुराते हुए उसने मुझे धन्यवाद दिया फिर अपनी राह पकड़ ली उस दिन पहली बार मेरी मुलाकात हुई थी बुदू से ..... बुदू एक पहाड़ी कोरवा था और गांव में ही खेती किसानी करता था उसके परिवार में उसकी बूढ़ी मां और पत्नी के साथ वह रहता था। मां बिमार थी तो उसके लिए दवाई लेने गांव की चिकित्सीका जिसे मितानिन कहा जाता है उन्हीं के पास उसे अपनी मां के लिए दवाई लेने जाना था तो उन्हीें का पता पूछ रहा था पूरानी मितानिन की सेवा समाप्त हो चुकी थी और नई मितानिन का पता कई लोगों को मालूम नहीं था। बूदू से मिले मुझे चार माह हो चुके थे और हम एक दूसरे को भूल गये थे तभी एक रोज महेशपुर में मैं जहां रहता था वहां की चाची ने मुझे पहाड़ जाने के लिए साथ किया किसी के पास उनका पैसा बाकि था जिसे लेने जाना था तो और चाचा जी को बाजार मसाले बेंचने जाना था तो अकेली कैसे जाती इसलिए रीता और मुझे अपने साथ ले गई मेरी एक आदत थी की मैं जब भी किसी गांव में जाता था तो एंटीबायोटिक दवाईयां और पैरासीटामोल की कुछ गोलियों अपने साथ रख ही लेता था मैं जानता था कि शहर के लोगों को गांव की ठंडी हवायें जल्द ही अपना असर दिखा देती हैं और सर्दी खांसी या बूखार हो ही जाता है इस लिए मैं पहाड़ जाने से पहले भी अपनी सुविधा जनक दवाईयां मितानिन चाची से लेकर पहाड़ की ओर चल पड़ा दो घंटे तक उंचे पहाड़ का चढ़ाई करने के बाद जब हम कोरवाओं के बीच में पहुंचे तो देखा कि गांव में बिमार लोगों की बहुत अधिक संख्या है और जो स्वस्थ हैं वे भी इनके संपर्क में आकर बीमार हो रहे हैं हम जिस घर में गये थे वहां भी एक महिला की तबीयत बहुत खराब थी मैंने उससे पूछा कि क्या हो गया है आपको तो कहने लगी पता नहीं लेकिन बैगा ने उन्हें भूत प्रेत का साया बताया है और निजात दिलाने के लिए शराब और मुर्गा मंगाया है। मैने उसकी नब्ज छूकर देखा तो और मुझे मलेरिया की शिकार महिला को पहचानते देर न लगी मेरे पास कुछ क्लारो क्वीन की गोलियां थी और कुछ लारीयागो डि एस की मैंने लारियागो की गोली दुध के साथ उसे लेने के लिए कहा और उसे अपने हांथों से खिलाकर उसके घर से निकलने लगा तभी मैं किसी लोहे से काले और मजबूर इंसान से टकरा गया, अपनी निगाहें उठाकर देखा तो वो कोई और नहीं वही बुदू था जिसे मैं चार महिने पहले मिला था उसने मुझे एक नजर में ही पहचान लिया और घर के अंदर आने के लिए कहने लगा वो बुदू की पत्नी थी जो बीमार अवस्था में जमीन पर मैले चादर बिछाकर लेटी थी और उसकी मां को गुजरे 20-22 दिन ही हुए होंगे। वो बेचारी भी मरेलिया का ही शिकार हो गई होगी और इलाज नहीं हो पाने के कारण टाईफाईड हो गया होगा। मैंने बुदू को दो दिन की और खुराक देते हुए उसे दुध के साथ समय पर अपनी पत्नी को देने की सलाह दी और हम आगे बढ़ गये । पहाड़ में हम शाम 4 बजे तक रहे और पहाड़ की ठंडी हवाओं व प्रकृतिक सौंदर्य का दृश्य आंखों में बिठाकर अपने घर वापस आ गये । एक सप्ताह बाद बुदू और उसकी पत्नी बाजार जाने के लिए पहाड़ से नीचे आये तो सबसे पहले मेरा पता पूछते हुए मेरे कमरे तक आ गये और मेरे लिए एक देशी मुर्गा भी अपने साथ लेकर आये थे मैंने कहा इसकी क्या जरूरत थी तब बुदू ने कहा आपकी दवा से मेरी पत्नी पूरी तरह स्वस्थ है और जिसे हम बैगा को देते उसे आप रखिये। मेरे लाख मना करने के बाद भी वो नहीं माने और उसे मेरे पास ही छोंड़ गये। 

शेष अगले अंग (13 मार्च 2013 ) में